
मैं हरा नही ,
हौशला हैं , इरादे हैं , तमन्ना हैं ,
बुलंदी को छूने की ,
हैं यकीं मुझे ,
पहुचुंगा एक दिन ,
उस आसमा के पार ,
जहाँ बसी हैं ज़हान दुशरी |
देखता हूँ हर तरफ जब ,
बेचैनी का आलम भरा ,
दर्द की परछाइयाँ भरी ,
सोचता हूँ की बदल दूंगा सब ,
आएगी फिर से दीवाली ,
लाएगी खुशहाली |
पर देखता हूँ जब ,
अपनी तन्हाई ,
साथ मे एक परछाइ , तो
दहकती हैं साँसे ,
रुकते हैं कदम ,
कुछ करने से ,
जो याद दिलाती हैं मुझे ,
हरपल अपने हार की |
याद करता हूँ अपने जज्बात को ,
और सोचता हूँ ,
रास्तें मुश्किल हैं , पर इरादे बुलंद,
आसमा के पार की ,
मैं हरा नही ,
हौशला हैं , इरादे हैं , तमन्ना हैं ,
आसमा के पार की ................
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